.” तपते कैनवास पर चलते हुए” : देश की राजधानी मुंबई को मायानगरी कहते हैं जिसका प्रमुख आकर्षण यहाँ का फ़िल्म-संसार है . फ़िल्मों की चौंध से देश भर ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग खिंचे चले आते हैं . विशेष कर देश की युवा पीढ़ी इसी आकर्षण के चलते फ़िल्मों में अपने कैरियर की तलाश करती हर रोज़ सैंकड़ों की तायदाद में यहाँ पहुँचती है . पर मुंबई फ़िल्म उद्योग में अपने लिए कोई जगह बना पाना किसी सामान्य परिवार के आम युवा के लिए आसान होता है क्या ? फ़िल्मों में कुछ रचनात्मक कर गुज़रने के लिए यह मायानगरी जाने कितने इम्तहाँ लेती है !.. फिर भी कुछ हासिल हो जाये इसकी कहीं कोई गारंटी नहीं है यहाँ . शुद्ध निजी रिस्क पर टिके इस उद्योग के प्रति जितना निर्मम देश की सरकार और आर्थिक व्यवस्था है उतना ही समाज भी है . यह उपन्यास पूँजी ताक़त और अंडरवर्ल्ड के दुष्चक्र में फंसे इस उद्योग में अपनी मेधा आज़माने आये नायक प्रवाल के संघर्ष के दौरान अदृश्य शिकंजों में फँसी और छीजती जाती मानवीय संवेदनाओं के दुर्भिक्ष की एक मार्मिक दास्तां है . प्रवाल मल्लिका और नम्रता के विरल त्रिकोण के बीच एक युवा सम्भावना जिस तरह क़स्बे से मायानगरी में पहुँच कर अपने सपने की क़ीमत चुकाती है ... वही इस उपन्यास का तपता कैनवास है . एक बेहद पठनीय और अपने समय को गहराई से देखने वाला उपन्यास है...