’तथापि जीवन’ में मनोज कुमार झा समकालीन कविता को एक नई लोकधर्मी संवेदना के साथ पेश करते हैं। ये कविताएँ जीवन के उन कोनों में प्रवेश करती हैं जहाँ रोज़मर्रा की व्यथा विस्थापन स्मृति और संघर्ष धूल-धक्कड़ के साथ साँस लेते हैं।झा की कविताओं में गाँव की गंध है खेतों का सूनापन है शहर का कोलाहल है और सत्ता की चालाकियाँ भी हैं। वह बिना शोर किए बेहद सादगी और पैनी दृष्टि से हमारे समय के सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ को कविता में पिरोते हैं।लोकभाषा की मिठास मिथिला की मिट्टी और अनुभव की सच्चाई को अपने लहजे में समेटते हुए मनोज कुमार झा ने ''तथापि जीवन'' में न केवल जीवन की विडंबनाओं को दर्ज किया है बल्कि उसके पार जाने की संभावनाओं को भी रेखांकित किया है। इनमें रागसिक्त जीवन के वैभव से मिलने वाले सुख भी हैं और ग्रामीण जीवन के उजाड़ से उपजे दुख भी।मनोज कुमार झा की कविताएँ भाषा के स्तर पर भी कई नए प्रयोग करती हैं और हिंदी कविता को एक अलग तरह के संगीत से समृद्ध करती हैं।यह संग्रह हमारे समय के ईमानदार कवि की आवाज़ है-एक ऐसी आवाज़ जो बहुत धीरज से कहती है : तथापि... जीवन फिर भी चलता है।
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