यह पुस्तक मात्र मुद्रित पृष्ठों का एक समूह ही नहीं अपितु यह उद्गार है एक खलिश है। एक टीस कसक वेदना है; जिसका दंश इस जीव ने भीतर ही भीतर झेला है। और उस यात्रा का संक्षिप्त विवरण है। (मैं कहाँ हूँ- मुझे कहाँ जाना है - कैसे जाना है) कश्मीर में प्रवास के दौरान नया ज्ञान स्रोत मिला। लद्दाख प्रवास व हिमाचल में रहने के दौरान विभिन्न पद्धतियों को नज़दीक से देखने का अवसर मिला। लगभग तीन दशकों से ध्यान मार्ग को समर्पित विभिन्न अधिकृत संस्थाओं से जुड़ा रहा। बहरहाल भैया जी को मेरे भेजे हुए मैसेजेस के भाव भाषा दिशा; सहज ही पाठकों को मेरी तीनों स्थितियों से परिचित करवा देंगे ऐसा विश्वास है। पाठक उन पलों को जीवंत महसूस करेंगे। मूक abstract अमूर्त भाषा गद्य से शुरुआत। मन विश्वास- अविश्वास के बीच झूल रहा था। फिर मार्ग और लक्ष्य मिला। अब भाषा और भाव में परिवर्तन स्पष्ट झलकेगा। गद्य और पद्य का मिश्रण और फिर अंत में लयबद्ध कविता का पुट। पुस्तक में कुछ संतों के भैया के प्रति भाव सुमन भी संलग्न हैं। आशा है पाठक इसे अपनी यात्रा में सार्थक सहयोगी पाएंगे। मेरा उद्देश्य प्रत्येक पाठक को अपने स्वयं के यक्ष प्रश्न खोजने में और उनके उत्तर ढूंढने में उत्प्रेरक बनना है। यदि ऐसा होता है तो मैं इस प्रयास को सार्थक समझुँगा।
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