अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेस्टसेलिंग रही द करेज टु बी डिस्लाइक्ड के सीक्वल के रूप में लिखी गई यह पुस्तक हमें जीवन कैसे जीना चाहिए इस पर गहराई से विचार करती है। इसकी लाखों प्रतियाँ जापान में बिक चुकी हैं। द करेज टु बी डिस्लाइक्ड की तरह इस किताब में भी सुकरात व उनके शिष्यों के बीच चलने वाले संवाद की तर्ज़ पर एक दार्शनिक व एक युवक के बीच संवाद होता है। दार्शनिक का मानना है कि अल़्फ्रेड ऐडलर के सिद्धांत हमें ख़ुशी और संतुष्टि भरे जीवन को जीने का तरीक़ा बताते हैं। ऐडलर उन्नीसवीं सदी में मनोविज्ञान की एक बड़ी हस्ती थे जिन्हें भुला दिया गया और लम्बे समय तक जिन्हें अपने समकालीन फ़्रायड और युग की तुलना में कम महत्त्वपूर्ण समझा गया। नौजवान को इस बात को लेकर संशय है कि केवल अपनी सोच को बदलकर जीवन को क्या सचमुच बेहतर बनाया जा सकता है। दार्शनिक उस नौजवान को बहुत धैर्य के साथ ऐडलर के ‘साहस के मनोविज्ञान’ का सार समझाता है और उसे पाने के लिए किए जाने वाले आवश्यक मानसिक उपायों के बारे में बताते हुए स्पष्ट करता है कि किस तरह उससे हमारे जीवन जीने के तरी़के में बदलाव आ सकते हैं। यह किताब वाकई ज़िंदगी को बदलने की ताक़त रखती है और इसे सार्वभौमिक रूप से लागू किया जा सकता है।