TISRA KIRDAR


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About The Book

कहानी एक किरदार की है जो लिखना चाहता है... उसे एक के बाद एक दो परछाइयाँ दिखती हैं जो तुरंत ही असली सूरत में आ जाती हैं । एक हैं 1860 के बाद के मरणासन्न लेकिन शाही कुर्सी पर बैठे ग़ालिब और दूसरे ऊर्जा से भरे हुए इधर-उधर टहलते नौजवान कबीर यह पूरी कहानी एक ही रात की है । ग़ालिब अपनी 7 औलादों की मौत के ग़म 1857 की स्मृति और कुछ-कुछ मति भ्रम के शिकार हैं उनकी लिखी हुईं करीब ढाई सौ चिट्ठियों से बिल्कुल अलग और उदास ग़ालिब को खोजा है इसकी पुष्टि कबीर से बात करते हुए होती रहती है । कबीर अपने पूरे दर्शन के साथ मौजूद हैं और वो ख़ुद अपने जीवन के बारे में अलग दृष्टिकोण के साथ बताते हैं ग़ालिब और कबीर की कविताएं इस्तेमाल की हैं और यह सिद्ध करने की भी कोशिश की है कि वो कविताएं बिल्कुल एक जैसी हैं मानो कोई शोध है मगर कहानी के फॉरमेट में... इसके साथ ही कल्पनाओं की सीमाओं को लांघते हुए दृश्य हैं कमरे में कुछ अन्य आवाज़ें भी सुनाई देती रहती हैं जो किरदार और कहानी दोनों को ही विस्तृत करती हैं । किरदार ग़ालिब-कबीर से बातचीत के दौरान शब्द-विवेकी कौन है ? इस सवाल से बार-बार जूझता रहता है जिससे कहानी का दार्शनिक पक्ष सामने आता रहता है । जब ग़ालिब-कबीर अचानक गायब हो जाते हैं फिर किरदार का सामना एक लेखक से होता है और वह दावा करता है कि यह किताब उसने लिखी है यह उसकी कृति है जिसमें ग़ालिब-कबीर की तरह किरदार भी तीसरा किरदार है लेकिन बहस-मुबाहिसा के बाद लेखक चला जाता है और तीसरा किरदार रात में जो लिखने के लिए उठा था उसे वह पूरा करता है ।
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