दरअसल उपन्यास जीवन का चित्र है जिसको फ्रेम में करीने से रचनाकार मढ़ता है तभी वह मूर्तरूप लेता है। जब मन-मस्तिष्क में कोई बिंदु केंद्रीकृत होकर अपनी सघनता व स्थूलता की ओर बढ़ने लगता है सूक्ष्म ब्योरे आसंजित होकर उसे प्राणवान बनाने लगते हैं तब उपन्यास का जन्म होता है। यह उपन्यासकार के ऊपर है कि उसने इसे जन्म देने में किन-किन ‘स्वास्थ्यवर्धक’ उपायों को यथाविधि अपनाया या लापरवाही से काम लिया। उसने कितने सलीके से मानसिक प्रत्यक्षीकरण को शब्दों में पिरोया। इसका फैसला पाठक बड़ी आसानी से कर देते हैं। सच कहूं तो मैं दोबारा उपन्यास नहीं लिऽना चाहता था। इसके आत्मकथा क्रम पर एक नज़र डालने से मेरी बात कुछ और साफ हो जाएगी जो यहां अभीष्ट लग रही है। 1979 में हाई स्कूल की परीक्षा में बायो में एक नंबर से सप्ली आने अर्थात फेल होने के बाद पिता जी ने मुझे यह कहकर बुला लिया कि आगे पढ़ने के तुम्हारे लक्षण नहीं दीऽते। घर पर पांच- छह सौ बीघे की काश्त है। मैं अकेले देऽ भी नहीं पाता। ज़मींदारी अब रही नहीं कि हुक्म देते ही सब काम संपन्न हो जाए। पिता जी थे भी कुछ अधिक कट्टर। इसी उलझन में सप्ली की परीक्षा मैंने नहीं दी और चल पड़ा गांव विवशता समझकर। बलरामपुर (उत्तर प्रदेश) से 63 किमी- दूर हिमालय की शैवालिक पहाड़ियों और वल्लरियों के बीच जहां मेरा जन्म तो हुआ था लेकिन चौथे साल के लगते ही बलरामपुर भेज दिया गया था पढ़ने के वास्ते। माता जी गांव पर ही रहती थीं। मेरे दोनों बड़े भाई बलरामपुर में आजी के साथ रहते थे और पढ़ाई करते थे। मैं भी वहीं रहकर पढ़ने लग गया था।