हिंसक परिस्थितियों के बीच अभिव्यक्ति के खतरे मोल लेने वाली जन्मभूमि में वेदखल नसलीमा नसरीन तीन दशकों के निवासन की समाप्ति का अभी भी इंतजार कर रही हैं। तसलीमा के बहाने दुनिया में आग्नों की सामाजिक और राजनीतिक हैसियत का आंकलन करने के लिए डॉ पूजा तिवारी द्वारा किया गया यह पुस्तकीय प्रयास समय का महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है। तसलीमा नसरीन की रचनाओं को आधार बनाकर लिखी गई यह पुस्तक स्त्री के जीवन में धर्म पितृसत्ता और राजनीति के जटिल चक्रव्यूह को समझने का प्रयास करती है। यह पुस्तक तसलीमा की दृष्टि से उन विचारों और अनुभवों को देखती है जो स्त्री को सदियों से धर्म और समाज के नाम पर बंधनों में जकड़े हुए हैं। यह पुस्तक केवल तसलीमा के लेखन की साहसिकता और उनकी सामाजिक धार्मिक और पितृसत्तात्मक व्यवस्थाओं के खिलाफ उठाई गई आवाज की सराहना तक सीमित नहीं है बल्कि इस पुस्तक का विस्तार दुनिया में लैंगिक असंतुलन पैदा करने वाली ताकतों की पड़ताल तक है। पुस्तक की लेखिका दुनिया को लैंगिक रूप से निरपेक्ष बनाने और सामाजिक आंदोलनों को प्रभावी बनाने के प्रयासों को बढ़ाए जाने का सुझाव रखती हैं। - प्रो. कृपाशंकर चौबे (वरिष्ठ पत्रकार)
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