सीरीज का पहला खण्ड रावण के तरुणावस्था से आरंभ होता है जब वह देखता है कि माता पार्वती के लिए बनाए गए उनके सपनों के स्वर्ण महल को दक्षिणा में महादेव से माँग लेने के लिए उसकी राक्षसवंशी माता कैकसी द्वारा पिता महर्षि विश्रवा को बाध्य किया गया। रावण की शिक्षा राजगद्दी के लिए प्रतिस्पर्धा षड्यंत्र तिरस्कार लंका विजय अलकापुरी विजय पुष्पक विमान पर कब्जा नागलोक विजय मंदोदरी से प्रेम जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं से गुजरते हुए कैलाश पर्वत पर शिवजी से हुए टकराव तक की कहानी को इस खण्ड में संवाद शैली में प्रस्तुत किया गया है। रावण के जीवन में जो घटनाक्रम घटित होता है उसको पढ़ने हुए लगता है कि जैसे उसकी सारी क्रूरता व्यक्तित्व के अंतर्निहित दुर्गुण न होकर परिस्थितिजन्य प्रतिक्रियाएँ थीं। यह पहला खण्ड पचास अध्यायों और लगभग सवा लाख शब्दों का है।