Tujhe Dekh Nikalti Aah

About The Book

जीवन निरंतरता का अपर अभिधेय है।रुक जाना हीं तो मर जाना है। जबतक जीवन है उसमें बहाव है गति है।ये सारा जगत गतिशील है।इस जीवन में सिर्फ और सिर्फ आह और वाह का निर्वाह है।प्रकृति हमें अपने अनुपम रुप छटा का दर्शन कराती रहती है।उसे देखकर हमारी अंतरात्मा में अनेक प्रकार के भाव उठते और मिटते हैं।उन्ही भावों में कुछ सुखद होते हैं तो कुछ दुखद होते हैं।जब प्राणी को सुख की अनुभूति होती है तो वह वाह करता है। जबकि दुखद अनुभूति पर आह करता है।कभी कभी मानव अपनी कल्पना से परे का दर्शन और साहचर्य पाकर भी आह!व्यक्त करता है पर ये जो आह है वह वास्तव में एक सुखद आह है।इस आह को यदि हम और स्पष्ट करना चाहें तो हरिवंशराय बच्चन जी की अभिव्यक्ति में कह सकते है -- पिडा में आनंद जिसे हो आए मेरी मधुशाला।बस वहीं हमारी भी बात है जो आपके सम्मुख तुझे देख निकलती आह के रुप में प्रस्तुत है।इस संग्रह में मानव जीवन अपने जीवंत रुप में उद्घाटित है।किसी तरह का भी आडंबर नहीं है।बस हमने जिस रुप में भावना को देखा उसी रुप में आपको भी दर्शन कराने का हमने सार्थक प्रयास किया।उस भावना के अश्रुत अपूर्व भाव भंगिमा को देखकर हमारे हृदय से विस्मय कारक आह! निकाल पड़ा।मैं तो बस विस्मित रहा जबकि वह और स्मित रही।मैं आह कर बस अब भी अपने बिस्फारित नयनों से देख रहा हूं।इसके अलौकिक कार्य व्यवहार को देख देखकर सभी चकित हैं।सच कहें तो सभी दर्शक बस निर्निमेष हो चिंतनीय अवस्था में है। न कुछ कह सकने की बात है और न चुप रह सकने की बात। ठीक वही स्थिति है केशव कही न जाय का कहिए।जब वह अपनी राह निकलती है तो इधर आह निकल रही है।जीवन के विविध अवसर का विविध रंग है।जो भी इस रंग को देखा सबने उसे अपने अपने अनुसार स्विकार किया है।सबकी अपनी अपनी दृष्टि है।कोई सिद्ध दृष्टि है तो कोई गिद्ध दृष्टि।कोई कोमल तो कोई कठोर।कोई सजग तो पर है सबकी दृष्टि। किसीको उसकी चाह है तो किसीको आह।ऐसी विकट परिस्थिति में भी तटस्थ कोई एक ऐसा भी है जो चाह की राह में भी अपने आह को निर्वाह रहा है।हो सकता है वह तटस्थ द्रष्टा आप हो या हम।जीवन के हर एक कदम हर एक मोड़ पर भावना मुझे खड़ी मिली है। हमें कबकहांकैसी भावना मिली है वह सब आपके आगे हैं।आप भी उसका दर्शन किजिए और अपने करता देखा करता पाया हमें भी बताइएगा। हमें देखकर आह निकली थी हो सकता है आपको वाह निकले।अरे वाह हीं क्यों चाह भी निकल सकती है।पर उसके निकलने से क्या क्या निकलती है ये सब बात आपके उपर हीं छोड़ता हूं।पर एक आग्रह के साथ की चाहे आह निकले या वाह निकले याकि निकले चाह पर आप मुझे इससे अवगत जरुर कराइयेगा। इसी आशा और विश्वास के साथ मैं अपनी भावना को देख निकलती आह के रुप में आपको सौंपता हूं।भारतका एक ब्राह्मणसंजय कुमार मिश्र अणु
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