गजल शब्द फारसी से आया है। ये इरान से हिंदुस्तान आया। शुरुआत में यह नबाबों के मनोरंजन के साधन मात्र था। विदित है कि यह प्रारंभ में कसीदे के रूप में आया। दरबार में रहने वाले दरबारी कवि अपने नबाब के खुशामद में झुठी प्रशंसा किया करते थे। जिसमें हुश्न और इश्क़ का कल्पनातीत चित्रण होता होता था जो नबाबों के कामाग्नि को और प्रदीप्त करता था। यह हिंदुस्तान में उन्ही के साथ आया। कहने को हम कह सकते हैं कि गजल नबाबी ठाट का देन है।नबाबों के दरबार से निकाल कर बाहर जनसामान्य के बीच इसे सुफी संतों ने परोसा। बात चाहे जो हो पर हिंदी में इस असर को लाने का श्रेय जाता है अमीर खुसरो को। यहीं से यह हिंदुस्तान की आबोहवा में पली बढी। उर्दू गजल मुख्यतः प्रेम की भावनाओं का चित्रण मात्र रहा। अच्छी गजलें वही समझी जाती रही जिसमें इश्क और हुश्न की बातों को असरदार ढंग से खीदमते पेश किया गया हो। पर हिंदी गजलों के साथ ऐसी कोई बात नहीं रही। हिंदी गजल जनवादी अभिव्यक्ति का माध्यम बनी। वह आम आदमी के दुख दर्द को आत्मसात कर उसे मुखरित करती रही है।अमीर खुसरो के बाद कबीर दासशौकी और भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इसकी परंपरा को आगे बढाया। तत्पश्चात इसे बद्रीनारायणप्रेमधन श्री़धर पाठकपं. रामनरेश त्रिपाठीपं. सूर्यकांत त्रिपाठी निरालाशमशेरत्रिलोचन शास्त्री ने इसे पल्लवित पुष्पित किया!हलांकि शमशेर ने इस विधा को गति और दिशा दोनों प्रदान करने में स्तुत्य योग दिया है।आगे चलकर इस परंपरा के वाहक बने हंसराज रहबरपं.जानकी बल्लभ शास्त्रीपं. रामदरस मिश्र। इनलोगो नें हिंदी गजल के नूतन सौंदर्य शास्त्र का प्रणयन कर एक नया रूप गढा। हिंदी साहित्येतिहास साक्षी है कि हिंदी गजल के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर दुष्यंत कुमार ने इसके माध्यम से एक नई क्रांति का सूत्रपात किया। और आज वह गजल हिंदी साहित्य में एक अनुपम उपलब्धि के साथ समादृत है।प्रस्तुत हिंदी गजल संग्रह तुम ऐसी तो न थी बस उसी परंपरा के निर्वाह में मेरा एक लघु प्रयास मात्र है। इसमें आपको वह सब मैंनें देनें का प्रयास किया है जो परंपरागत रूप से लेकर आजतक इसकी अवधारणा में समाहित है।आप की दृष्टि चाहे जहां तक गई हो या जा सकती है वहां तक स्पष्ट रूप से आपको देखने के लिए वैसा ही मिलेगा जैसाकि मैंने अनुभव किया है। जीवन के हर क्षेत्र और अवसर पर हर लोगों के साथ मुझे इसे देखने का सुअवसर मिला। जो जनवादी तडप और ललक हमने अपने आसपास देखापाया भोगा बस उसी को आपके पास परोसा हुं। यह संग्रह आपको अच्छी लगेगी मुझे ऐसा विश्वास है।यदि कहीं किसी तरह की कुछ कमी रह गई हो तो क्षमा प्रार्थी हुं। गलतियां करना और होना मानवीय स्वभाव है ऐसा समझकर मुझे क्षमा कर देंगें।और अंत में चलते चलते बस यही कहुंगा कि यदि आपको भी कहीं ऐसा लगता है वह बदल गई है तो कहने में आखिर संकोच कैसा कि तुम ऐसी तो न थी दिल खोलकर करना चाहिए और आप कहिए। नहीं तो आपकी सपना मर रही है।वह बदल गई है।वह इतनी बदल गई है की पहचान पाना मुश्किल है।यदि आपको ऐसा कुछ लगता है तो मिलकर कहिए तुम तो बदल गई।तुम ऐसी तो न थी? बस इतनी सी प्रार्थना है।भारतका एक ब्राह्मण.संजय कुमार मिश्रअणु
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