कवियों एवं समाज के होनहार युवाओं को समर्पित यह काव्य उन छोटी-बड़ी संवेदनाओं का संकलन है जो आपके जीवन में और वातावरण में तैर रही हैं। कभी उल्लास के साथ जीवन की कल्पना कभी प्रेम का समर्पण और कभी अभावग्रस्त मायूस माहौल। मेरा ध्येय आपको पांडित्य प्रदर्शन एवं छंदों अलंकारों में उलझाकर रखने का नहीं बल्कि अपने आसपास जो घटित हो रहा है उसे सपाट शब्दों में आपके सामने परोसने का है। कहीं तुकांत तो कहीं खुली किताब की तरह सपाटबयानी आपको इस कृति को अंत तक पढ़ने को विवश कर देगी।'मैं एकलव्य हूँ'... आपको भी एकलव्य बनाने का विमर्श लेकर यह प्रयास आपके सामने है। समाज के सभी वर्गों एवं सभी आयुवर्ग के हस्ताक्षरों से विनम्र निवेदन है कि मेरे इस प्रयास को सफल बनाएँ और मेरी त्रुटियों को सुधारने का मुझे मौका दें। 1988 में साहित्यागार जयपुर से प्रकाशित मेरा नाटक 'उदयन' आप पढ चुके हैं। लंबे अंतराल के बाद इस उत्कृष्ट प्रकाशन हाउस से मेरा ये दूसरा कर्मफल आपके सामने है। धन्यवाद !आपका प्रिय एवं हृदय अंश-मिश्रीलाल मीना 'एकलव्य'