लीलाधारी मनमोहन अपने चचेरे भ्राता उद्धव को ब्रजमण्डल की अनपढ़ गोपियों को ज्ञान योग की शिक्षा देने के लिए भेजते हैं। अपने नवीन वस्त्र पहनते हैं अपनी ही तरह सजाकर अपने ही रथ पर बैठाकर विदा करते हैं। कहते हैं कि गुजरियाँ जो मेरे लिये सन्देशा दें लौटकर मुझे अवश्य बताना। उद्धव देवगुरु ब्रह्माजी के शिष्य हैं ज्ञान योग की शिक्षा ली है। परम ज्ञानी योगी उद्धव बृजमण्डल पहुँचते हैं। पहले नन्द महल पहुँचकर बाबा नन्द और यशोदा माता का समाचार जानते हैं। उद्धव को बाबा भोजन कराते हैं। यशोदा माता श्रीकृष्ण का मित्र मानकर बहुत प्यार करती हैं पूछती हैं मेरा कान्हा कुशल से तो है। माखन मिश्री कान्हा को बहुत भाती थी क्या वहाँ कोई खिलाता है ? रोने लगती हैं। उद्धव धैर्य बंधाते हैं।