Ujale Hamare Ghr Bhi Ana

About The Book

यह उन कविताओं का संग्रह है जो विभिन्न समय पर समय की प्रतिक्रिया के रूप में मेरे मन से उद्भासित हुई हैं। जैसे युद्ध के लिए शांति की इच्छा -शांति दूत शांति की शपथ; भविष्य की अनिश्चितता के लिए -मेरा कल कैसा है रे तू। फिर चीजों को देखने और उसे समझने की एक प्रक्रिया है जो आम आदमी समझता तो है व्यक्त नहीं कर पाता। कविताओं में आम जन की जिज्ञासा है उसका संभावित समाधान की उनकी कल्पना है। दु:ख से साक्षात्कार है अनुभवों का आधार है और आक्रोश की अभिव्यक्ति है। आम आदमी का विचार है मेरी कविताएं। लिखी मैंने है किन्तु प्रेरणा आम आदमी की प्रतिक्रियाओं ने दी है। आम आदमी की आकांक्षा क्या है देखिये और गुणिए।कुछ हास इधर लुढ़का देना मेरी उमर बीत गयी रोदन में।क्या कहूँ कि मैंने क्या-क्या रोया।मैंने है अपना तन रोया। मैंने है अपना मन रोया।जो वचन तुम्हें देकर आया सच कहता हूँ वो वचन रोया।रहा सजाता तन अपना और रहा ढहाता मन अपना।फिर भंग खुद से ही वचन अपना।संचित बस किया रुदन अपना।बस स्वार्थ ने मुझे हराया है और इसके हर सम्मोहन ने।कुछ हास इधर लुढ़का देना मेरी उमर बीत गयी रोदन में।अब भव्य करो मेरा जीवन और दिव्य करो मेरा चिंतन।ईर्ष्या लिप्सा सब शमन करो। अविवेकों का सब क्षरण करो।जीवन का अर्थ परम कर दो। मेरा हर अहं हरण कर लो।ऐश्वर्य शौर्य मेरा धरम न हो। वनिता सुत केवल करम न हो।अपना सच मुझमें ढाल प्रभु। मेरा व्यक्तित्व सँभाल प्रभु।कर अपना आशय ख्याल प्रभु।बस मुझे रुलाता आया है हर भौतिकता के प्रयोजन ने।कुछ हास इधर लुढ़का देना मेरी उमर बीत गयी रोदन में।
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