Urdu Ke Mashhoor Shayar Josh Malihabadi Aur Unki Chuninda Shayari - (????? ?? ????? ???? ??? ????????? ?? ???? ??????? ?????)

About The Book

र्दू अदब के मशहूर शायर जोश मलीहाबादी की पैदाइश 5 दिसम्बर 1898 में मलीहाबाद में हुई। जोश मलीहाबादी का नाम उन शायरों में लिया जाता है जिन्होंने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ कलम के जरिए आवाज बुलंद की । आपके जरिये लिखे गए एक एक शे''र आम इन्सान के नारे में तब्दील हो गए। इसी वजह जोश मलीहाबादी को इंकलाबी शायर कहा जाता है। यूँ तो आपका नाम शबीर हसन खान है लेकिन ग़ज़लों और नज़्मों में तखल्लुस ‘जोश’ और अपने इलाके का नाम मलीहाबादी भी जोड़ दिया जिससे उन्हें जोश मलीहाबादी कहा जाने लगा। आपकी शुरुआती पढ़ाई घर पर ही हुई उर्दू और फारसी आपने घर ही सीखी। अंग्रेजी तालीम के लिए लखनऊ गए और बाद में आगरा के सेंट पीटर्स कॉलेज गए। आप छ: महीने रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय शांतिनिकेतन में भी रहे। लेकिन आपके वालिद बशीर अहमद खान के इंतकाल के बाद आगे की पढ़ाई जारी नहीं रह सकी। जोश 23-24 में ही बगावती तेवर वाली शायरी लिखने लगे थे। जोश को उर्दू साहित्य में उर्दू पर मजबूत पकड़ और उर्दू व्याकरण के बेहतरीन इस्तेमाल के जाना जाता है। जोश मलीहाबादी ने बहुत सी किताबें लिखी। 1921 में आपका पहला संग्रह आया जिसमें ‘शोला और शबनम'' ‘जूनून ओ हिकमत'' ‘फ़िक्र ओ निशात’ है। आपकी आत्मकथा ‘यादों की बारात’ और नज्में ‘जंगल की शहजादी'' ‘गुलबदनी’ देश-विदेश में खूब मशहूर हुई। जोश को वतन से इतना प्यार था कि पाकिस्तान जाकर वह कभी खुश नहीं रहे। वे हमेशा भारत को याद करते जिसे इस नज़्म से समझा जा सकता है -- ‘जनों फर्ज़न की व बस्तगी ने वतन सी चीज को आखिर छुड़ाया रहा मैं हिन्द की नजरों में मुस्लिम बना काफ़िर जो पाकिस्तान आया ।''.About the Authorनरेन्द्र गोविन्द बहल उर्दू और हिन्दी कविता में गहन रुचि रखते है जिसके कारण उन्होंने अधिकतर मुशायरों व कवि सम्मेलनों में शिरकत की थी इन्हीं आयोजनों की वजह से उन्हें साहित्य लेखन का भी शौक पैदा हुआ। लेखक की विभिन्न विषयों पर अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। लालकिले में होने वाले कवि सम्मेलन और मुशायरों से कविता-शायरी के प्रति प्रेम बढ़ा और वहीं से उन्होंने उन्हें कविता लिखना भी प्रारंभ कर दिया था। कविता गीत गजल शायरी को समझने के लिए उर्दू के मशहूर शायरों के जीवन के बारे में जानने के लिए उर्द भाषा सीखी।जब लेखक साहिर लुधियानवी कैफ़ी आज़मी जान-ए-सार अख्तर अली सदार जाफरी मजाज नरेश कुमार ''शाद'' आदि शायरों से मिले तो उनका पाठकीय दृष्टिकोण बदलने लगा और उन्होंने गालिब फैज़ जफ़र दाग आदि रचनाकारों को भी पढ़ना शुरू किया। इन शायरों को पढ़ते हुए लेखक के मन में एक उत्साह पैदा हुआ कि इन शायरों की पुस्तकें संपादित की जाएं। यह पुस्तक भी इसी उत्साह का नतीजा है।.
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