व्यक्ति का जन्म भले किसी जाति धर्म परिवार में हो परन्तु उसे सभी धर्मों से जुड़ने का आशीर्वाद प्राप्त हो सकता है क्योंकि आत्मा का कोई धर्म मजहब नहीं होता है। हमारा जीवन आत्मा का सफर है जो शरीर के अन्दर है शरीर से हमें कष्ट पहुंच सकता है सामाजिक जीवन में व्यक्ति के शरीर का कष्ट स्पष्ट दिखता है जो व्यक्ति को दिखता है। आत्मा को देखने के लिए विशेष ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो आध्यात्मिक ऊर्जा युक्त गुरू के पास होती है और वे ही हमारा जीवन पढ़कर मार्गदर्शन कर सकते हैं।समाजिक चश्मा और आध्यात्कि चश्मे के नम्बर में भिन्नता पाई जाती है। भविष्य के जीवन यात्रा में एक आत्मा को किस प्रकार का सामाजिक संसर्ग मिलेगा उसकी क्या परिस्थितियाँ होगी इन सबका आकलन आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण व्यक्तित्व ही कर सकते हैं। जब इन आध्यात्मिक ऊर्जा का संरक्षण व्यक्ति को प्राप्त कर लेता है त बवे अपने सम्पूर्ण जीवन काल में उनकी उपस्थिति का अनुभव करते हुए मार्गदर्शन भी प्राप्त करता है।पुस्तक वर्तमान पीढ़ी के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है क्योंकि प्रतिस्पर्धा और आधुनिकीकरण की दौड़ में “सब कुछ हमारे हाथ में है” के भ्रम में व्यक्ति तनाव व अनेकों बीमारियों का शिकार हो रहा है। वास्तव में सार्वभौमिक ऊर्जा में छुपी हुई ताकत को जब हम समझ लेते हैं तब मात्र कर्म हमारे हाथ में रहता है। शेष सफलता का दायित्व उस ऊर्जा पर निर्भर रहता है जो हमारे साथ सदैव रहती है।पुस्तक से मैंने केस स्टडी 4 रूप में उन आध्यात्मिक ऊर्जाओं को नाम व चित्र के साथ परिचय दिया है जिन्होंने जीवनोपरान्त भी उन परिस्थितियों में मार्गदर्शित किया जब जीवन की चुनौतियां सामने थीं। पुस्तक में 4 तीर्थस्थानों का वे पथ प्रदर्शकों कके इष्ट देवों का भी विवरण है जिनसे उन्होंने उर्जा प्राप्त करी थी। भारत की नदी नर्मदा गोलागोकर्णनाथ (खीरी) नैमिषारण्य व कानपुर के बिठूर क्षेत्र का पौराणिक महत्व दिया गया है जो यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य की यात्रा उसकी आत्मा का सफर है जो उसके पथ प्रदर्शक ही करा सकते हैं।पुस्तक के एक अध्याय में भारतीय परम्परा से जुड़े रीति रीतिरिवाज प्रतीक चिन्हों वैदिक मंत्रों इत्यादि में छुपी ऊर्जा को दर्शाया गया है। पुस्तक के अन्तिम कुछ अध्यायो में अपनी इस मानसिकता से जुड़े वैज्ञानिकता को समझाने के लिए जो पराविज्ञान के कोर्स किए हैं उनके सम्बन्ध कुछ प्रमुख जानकारी है।पुस्तक का प्रमुख उद्देश्य सामाजिक जीवन एवं सामाजिक व्यवहार के पीछे हुऐ पराविज्ञान के रहस्यों को उजागर करना है। मनुष्य सत्कर्म करते हुए अपना जीवन व्यतीत कर सकता है क्योंकि उसके कर्म ही प्रारब्ध अथवा संचित कर्मो के रूप में उसका साथ देते है। अन्धकार से उजाले की ओर और- उजाले से अन्धकार की ओर आने जाने की यात्रा ही जीवन है जिसमें हमें उन ऊर्जाओं (आध्यत्मिक गुरुओं) की भूमिका को जानना व पहचानना आवश्यक है।