आज जब अपने भावों को अभिव्यक्त करने के लिए कितने ही मंच उपलब्ध हैं। ऐसे में बहुतायत संख्या में लोग किताबों से दूर होने लगे हैं या हो गये हैं। स्कूली या अन्य परीक्षाओं में सफलता के लिए किताबें पढ़नी होती है इसलिए किताब पढ़ ले रहे हैं। बाकी किताबें अलमारियों की शोभा बढ़ा रहे हैं। किताबें या तो उस इस स्तर की छप नहीं रहीं कि पाठक मन लगा कर पढ़े। लेकिन ऐसा सोचना थोड़ा सही प्रतीत नहीं होता। छप रहीं सभी किताबें पढ़ने लायक नहीं रही ऐसा कहना सरासर गलत होगा। लोग निश्चित ही अध्ययन-अध्यापन से भाग रहे हैं। समय नहीं है का रोना रो रहे हैं। चार आंगुल का चमकता स्क्रीन सब कुछ निगलने उत्कट है। हालांकि इसी से साहित्य को एक नई उड़ान मिली है। लोग मन भुलावे के लिए व्हाट्सएप फेसबुक या अन्य माध्यमों से थोड़ा बहुत पढ़-लिऽ ले रहे हैं। बावजूद इसके किताबों की अहमियत न कम हुई है और न होगी। एक दिन सब किताबों की और लौटेंगे। इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए। वजह साफ है कि सोशल मीडिया में देखे जाने वाली खबरों में विश्वसनीयता और प्रमाणिकता का अभाव। दूसरी बड़ी वजह घर के भीतर सबकी एकाकी होती दुनिया। जो ज्यादा दिनों तक नहीं चलने वाली। लोग एकाकीपन से मुक्ति का जल्लद कोई उपाय ढूँढ़ेंगे।--पोखनलाल जायसवाल