सृजनशील रचनाकार उच्चकोटि का यायावर या घुमक्कड़ भी हो ऐसा संयोग प्राय: दुर्लभ होता है और जब होता है तो उसकी प्रतिभा अविस्मयरणीय कृतियों को जन्म देती है। प्रस्तुत पुस्तक उत्तर हिमालय चरित ऐसी ही एक असामान्य और अविस्मयरणीय कृति है जिसमें बांग्ला के सुख्यात यायावर-कथाकार प्रबोध कुमार सान्याल ने अपनी उत्तर हिमालय-यात्रा का रोचक रोमांचक और कलात्मक विवरण प्रस्तुत किया है। इस यात्रा-कथा में उत्तरी हिमालय-मेरुदंड के उन दुर्गम अंचलों की दृश्य-छवियों को शब्दों में उतारा गया है जिनसे हमारा परिचय आज भी नहीं के बराबर है और जहाँ की धूल का स्पर्श बाहरी लोगों ने शताब्दियों के दौरान कभी-कभी ही किया है। महासिन्धु वितस्ता विपाशा शतद्रु इरावती कृष्णगंगा चन्द्रभागा आदि नदियों के उस अनोखे उद्गम प्रदेश में पहाड़ी दर्रों के बीच दौड़ती-उछलती धाराओं के किनारे-किनारे चलता हुआ लेखक जैसे पाठक को भी अपने साथ ले चलता है और दिखाता है बिलकुल निकट से हिमशिखरों की अमल-धवल आकृतियाँ तथा सुनाता है एकान्त वन-प्रान्तर और नीरव मरुघाटियों का मुखर-मौन संगीत। इसी क्रम में वह जब-तब अतीत की गुफाओं में भी ले चलता है या फिर भविष्य की टोह लेने लगता है। समर्थ लेखक इस प्रकार अपनी यात्रा में पाठक को सहभागी ही नहीं सहभोक्ता बना देता है जो रचनात्मक उपलब्धि का सबसे बड़ा प्रमाण है। • सात पर्वतीय भूखंडों की यात्रा-कथा जो 1928 से शुरू होकर 1964 ई. तक चलती है। • विशाल हिमालय के इस पर्वतीय अभियान पथ में कई-कई नदियों जातियों बोलियों और भाषाओं की कथा जुड़ती चली है जिन्हें पढ़ना अपने ही देश को और हिमालय-क्षेत्र को नई आँखों से देखने सरीखा अनुभव है। • अंत:दृष्टि सम्पन्न लेखक सामान्य-सी दिखने वाली बात को भी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखता है और तब उसके अर्थ या महत्व बदल जाते हैं. जैसे कि भारत का चीन और नेपाल के साथ अभी जो सम्बन्ध है ऐसी परिस्थिति आ सकने की सम्भावना प्रबोध कुमार सान्याल 1965 से पहले देख चुके थे. इस किताब में वह सब विस्तार से पढ़ने को मिलेगा। • हिमालय से जुड़े सभी देशों के पारस्परिक सम्बन्धों को समझने में भी यह यात्रा-वृत्तान्त मददगार है। • बांग्ला के मशहूर साप्ताहिक ‘जुगांतर’ के सम्पादक रहे प्रबोध कुमार सान्याल स्वभाव से वैसे ही घुमक्कड़ और दुस्साहसी थे जैसे हिंदी में राहुल सांकृत्यायन. वे भारत और नेपाल के हिमालयी क्षेत्रों में ही नहीं एशिया के कई और देशों समेत यूरोप अमेरिका और रूस तक घूम आए थे. • हिमालय से अपने लगाव के कारण लेखक ने 1960 में कोलकाता में हिमालयन एसोसिएशन की स्थापना की. 1968 में उन्हें हिमालयन फाउंडेशन का अध्यक्ष बनाया गया. • यह किताब यात्रा और रोमांच का इतिहास और भूगोल का प्रकृति और ज्ञान का सुंदर मेल है. ऐसी किताबें हर आयु के हर तरह के पाठक के लिए पठनीय होती हैं. • हंसकुमार तिवारी का अनुवाद बहुत सुंदर और सुपाठ्य है.
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