हिन्दी भाषा के महान उपन्यासकार आचार्य चतुरसेन शास्त्री की रचना ‘वैशाली की नगरवधू’ वह उपन्यास है जिसकी गिनती हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में की जाती है। यह उपन्यास एक बौद्धकालीन ऐतिहासिक कृति है। लेखक के अनुसार इसकी रचना के क्रम में उन्हें आर्य बौद्ध जैन और हिंदुओं के साहित्य का सांस्कृतिक अध्ययन करना पड़ा जिसमें उन्हें 10 वर्षों का समय लगा। यह उपन्यास कोई एक-दो महीनों में पूर्ण नहीं हुआ बल्कि आचार्य शास्त्री ने इत्मीनान से इसके लेखन में 1939-1947 तक कि नौ वर्षों की अवधि लगाई। इस उपन्यास के केंद्र में वैशाली की नगरवधू के रूप में इतिहास-प्रसिद्ध वैशाली की सौंदर्य की साक्षात प्रतिमा तथा स्वाभिमान और आत्मबल से संबलित अम्बपाली है जिसने अपने जीवनकाल में सम्पूर्ण भारत के राजनीतिक और सामाजिक परिवेश को प्रभावित किया था। अपने इस उपन्यास के बारे में स्वयं आचार्य जी ने कहा था मैं अब तक की सारी रचनाओं को रद्द करता हूँ और ‘वैशाली की नगरवधू’ को अपनी एकमात्र रचना घोषित करता हूँ।