जब इतिहास हत्यारा बन जाता है तो अतीत ही एकमात्र हथियार होता है।मुंबई में एक के बाद एक शहर के सबसे प्रभावशाली स्तंभों को गिराया जा रहा है। एक शक्तिशाली बिल्डर एक विवादास्पद फिल्म निर्देशक एक भ्रष्ट राजनेता। उनकी मौतें सामान्य नहीं हैं। वे एक भयानक कला हैं जिन्हें एक भूली हुई पांडुलिपि 'काल-संहिता' के क्रूर श्लोकों के अनुसार अंजाम दिया गया है। मुंबई पुलिस के पास कोई सुराग नहीं है सिवाय एक छोटे प्राचीन भोजपत्र के टुकड़े के जिस पर एक ऐसी लिपि है जिसे कोई पढ़ नहीं सकता।उनकी हताशा उन्हें विक्रम सिंह राठौड़ के दरवाज़े तक ले जाती है। विक्रम एक प्रतिभाशाली इतिहासकार है जो गुमनामी में जी रहा है। उसे 'वंश' नामक एक प्राचीन हत्यारे पंथ पर अपने कट्टरपंथी सिद्धांतों के लिए अकादमिक समुदाय से बहिष्कृत कर दिया गया था। अब वही सिद्धांत जो उसकी बर्बादी का कारण बना शहर को बचाने की एकमात्र कुंजी हो सकता है।इंस्पेक्टर अंजलि शर्मा के साथ मिलकर विक्रम इस मामले में गहराई से उतरता है और जल्द ही उसे एहसास होता है कि वह केवल एक सलाहकार नहीं है। वह इस खेल का एक मोहरा है। हर सुराग हर प्रतीक उसे उसके अपने अतीत की ओर वापस ले जाता है। उसे पता चलता है कि 'वंश' केवल एक प्राचीन कहानी नहीं है बल्कि एक जीवित सांस लेता हुआ षड्यंत्र है जिसकी जड़ें उसके अपने परिवार के इतिहास में गहराई तक समाई हुई हैं। उसके पिता एक सम्मानित उद्योगपति इस खूनी पहेली के केंद्र में हैं।अब विक्रम को समय के खिलाफ दौड़ना है। उसे एक ऐसे दुश्मन को उजागर करना है जिसका कोई चेहरा नहीं है एक ऐसे पंथ को रोकना है जिसकी पहुँच सत्ता के उच्चतम स्तरों तक है और एक ऐसे अनुष्ठान को विफल करना है जो हमेशा के लिए दुनिया को बदल सकता है। उसे अपने पिता के पापों का सामना करना होगा और यह तय करना होगा कि वह उस विरासत को स्वीकार करेगा या उसे नष्ट कर देगा जिसने उसे बनाया है। वंश का विधान लिखा जा चुका है। क्या विक्रम अपना भाग्य फिर से लिख पाएगा?