प्रेमचंद की एक बहुत बड़ी खासियत यह है कि वे अपने पत्रों को आदर्शवाद के साथ-साथ यथार्थवाद के धरातल पर भी रखते हैं जैसा की वरदान में भी उन्होंने किया। उपन्यास के नायक प्रतापचंद्र को उनकी माता सुवामा पुत्र रूप में पाने के लिए 20 सालों तक देवी की कठिन तपस्या की ताकि उन्हें एक देश प्रेमी पुत्र प्राप्त हो सके और ऐसा होता भी हैं किन्तु प्रतापचंद्र प्रतिभा के धनी होने के साथ-साथ मानवीय गुणों भी रखते हैं जो कमलाचरण की मृत्यु के बाद विरजन को पाने के लिए के समय साफ तौर पर दिखाई देता हैं किन्तु अगले ही पlल वह विरजन को देख दृवित हो जाते हैं। यही वह मोड है जब प्रतापचंद्र एक नई राह पर निकल पड़ते हैं जिस राह पर वह दीन-दुखियों पीडितों दलितों रोगियों असहायों की सहायता करते हैं और एक नए अवतार ‘बालाजी’ के रूप में सबके सामने आते हैं। समग्र रूप से देखा जाए तो अपने समय का यह एक अनूठा अपन्यास है जिसमें प्रेम त्याग लोक-लाज कर्तव्यनिष्ठा समाज दृढ़ता करूणा ममता का अद्भुत संगम है।
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