वैदिक कविताओं के इस नवम खंड में ऋग्वेद के दशम मंडल के आरम्भिक पिच्यासी सूक्तों की सभी ऋचाओं का समावेश है। यहाँ एक ओर मृत्यु के विरुद्ध ऋषियों की ललकार सुनाई देती है वहीं दूसरी ओर जीवन का स्वागत करते हुए अनेक सूक्त उत्साह की ऊर्जा जगाते हुए चले आते हैं। यहाँ ''यम-यमी संवादÓ की उपस्थिति चकित करती है वहीं कवष ऐलूष का वह अक्षसूक्त झकझोर देता है जो एक द्यूतप्रणयी का करुण एकालाप है। ब्रह्मवादिनी घोषा की कविताओं को अपने हृदय की आँखों से देखना सचमुच ही रोमाञ्चक है। इस खंड में आई हुई ऋचाएँ लोक-जीवन को बहुत करीब से छूकर देखती हैं उसकी नब्ज टटोलती हैं और उसके लिये शुभ-संदेश छोड़कर उसमें ही रम जाती हैं। इस खंड में सम्मिलित प्राय: सभी कविताएँ मानुषी चेतना की दिव्य पुकार हैं इसलिये वे जितनी ऋषियों की हैं उतनी ही हमारी हैं। इस खंड में वह प्रसिद्ध विवाहसूक्त भी है जो सोम-सूर्या विवाह के रमणीय रूपक के साथ हमें लोकोत्तर संसार में उठा ले जाता है। इस सूक्त में ऋषि ने देख लिया है कि पृथ्वी मनुष्य के दिव्य रूपान्तर का केन्द्र है। वह अन्नमय से प्राणमय प्राणमय से मनोमय मनोमय से विज्ञानमय की यात्रा पूरी करता हुआ आनंदमय में पहुँचने के लिये जन्मना संकल्पबद्ध है। यह ऋग्वेद की विलक्षण महाकविता है जो लोक-जीवन को देव-सत्ताओं से जोड़ती हुई यह विश्वास जगाती है कि एक न एक दिन धरती पर दिव्य-प्रेम और दिव्य-शान्ति होगी। दिव्य जीवन का एक यही तो सनातन सूत्र है। -मुरलीधर चाँदनीवाला
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