यह कृति ‘वेदों के व्यावहारिक मंत्र’ चारों वेदों के गहन विराट और दुरूह भंडार से ऐसे मंत्रों का सुचिंतित चयन है जो सीधे मानव जीवन से जुड़े हैं और आज के समय में भी समान रूप से उपयोगी प्रासंगिक और मार्गदर्शक हैं। इस ग्रंथ का उद्देश्य वेदों को केवल विद्वानों या आचार्यों तक सीमित न रखकर उन्हें सरल भाषा और सहज शैली में सामान्य पाठक के लिए सुलभ बनाना है।वेदों से व्यावहारिक विषयों पर मंत्रों का चयन करना स्वयं में अत्यंत कठिन कार्य था। किंतु इस दिशा में पंडित रघुनाथ विनायक धुलेकर के शताधिक प्रवचनों का अमूल्य संग्रह अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ। धुलेकर जी ने वेदों के अनंत भंडार को मथकर जो सार निकाला था उसी को आधार बनाकर इस कृति में विषयवस्तु का चयन किया गया है। इस प्रकार वेदों के उस नवनीत को पुनः मथने की आवश्यकता नहीं पड़ी।आधुनिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए डॉ॰ अग्रवाल ने इस सामग्री को वेदों की मौलिक अवधारणा के अनुरूप और अधिक स्पष्ट व्यावहारिक तथा समकालीन बना दिया है। प्रस्तुत कृति में एक ओर योग और प्राणायाम आश्रम एवं वर्ण व्यवस्था काम मानव जीवन जैसे विषयों पर सारगर्भित विवेचन है वहीं दूसरी ओर ब्रह्म और आत्मा माया सार्वभौम धर्म पाँच महामंत्र तथा पृथ्वी के अनंत गुणों जैसे वेदों के केंद्रीय विषयों पर भी विचारपूर्ण सामग्री उपलब्ध है।ग्रंथ की विशेषता यह है कि मंत्रों की व्याख्या इस प्रकार की गई है कि उनके अर्थ समझने के लिए निघंटु और निरुक्त जैसे जटिल शास्त्रों की अनिवार्यता कम हो जाती है। सरल व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ वेदों के मर्म को स्पष्ट करती हैं। इसके अतिरिक्त मातृभूमि वेदों में युद्धकला तथा संस्कृत के विशेषज्ञ डॉ॰ बी॰बी॰ त्रिपाठी की विचारोत्तेजक भूमिका इस कृति को और अधिक समृद्ध बनाते हैं।