वीरता सदा से सम्मानित होती रही है। प्राचीन भारत में एक सैनिक के लिए धर्म युद्ध में भाग लेना गौरव की बात थी। युद्ध में विजय या पराजय की परवाह किए बिना लड़ना उसका धर्म था। युद्ध में वीरगति पाने वाले योद्धाओं को दिव्य अप्सराएँ सुख भोगने के लिए स्वर्ग ले जाती थीं। बाद में धराशायी वीरों को सम्मानित करने के लिए स्मारक बनाने की प्रथा भी शुरू हुई।अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित वीरता के मानदण्डों पर भारतीय सदैव खरे उतरे। मातृभूमि की रक्षा में कई सैनिकों ने अपने प्राण गँवाए और कई विकलाँग हो गए।वीरों में वीर उन्हीं सैनिकों नाविकों तथा वायु सैनिकों की शत्रु के समक्ष प्रदर्शित वीरता की गौरव गाथा को प्रस्तुत करने का यह एक प्रयास है।इस पुस्तक में परमवीर चक्र और महावीर चक्र से सम्मानित वीरों की कहानियाँ हैं। आशा है यह प्रयास युवा पीढ़ी में साहस वीरता और आत्मबलिदान की भावना पैदा करने में सहायक होगा।इतिहास प्रभाग रक्षा मंत्रालय की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध में अविभाजित भारत की सशस्त्र सेनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका का इतिहास लिखने के लिए की गई थी। 1947 में देश के विभाजन के बाद भी यह अनुभाग संयुक्त-अंतर-सेवा इतिहास अनुभाग (भारत और पाकिस्तान) नाम से कार्यरत रहा। इस अनुभाग ने कुल मिलाकर 25 ग्रंथ प्रकाशित किए। इसे 1963 में बंद कर दिया गया।इसी बीच 1953 में स्वतंत्र भारत की सेनाओं द्वारा की गई सैनिक कार्रवाइयों का इतिहास लिखने के लिए एक अलग इतिहास अनुभाग (भारत) की स्थापना की गई। इस अनुभाग के कार्यक्षेत्र में रक्षा मंत्रालय और तीनों सेना मुख्यालयों को सैनिक इतिहास तथा संबंधित विषयों पर जानकारी देना भी था। बाद में रक्षा मंत्रालय तथा सशस्त्र सेनाओं को समारोहों के संबंधित विषयों में परामर्श देने के लिए एक हेराल्डिक सेल की स्थापना की गई। अनुभाग के बढ़ते हुए दायित्वों को देखते हुए सन 1992 में इसका नामकरण इतिहास प्रभाग कर दिया गया। 1953 से अब तक इतिहास प्रभाग ने 10 पुस्तकें प्रकाशित की हैं।इतिहास प्रभाग रक्षा मंत्रालय तीनों सेना-मुख्यालयों के अभिलेखों का भी संरक्षण करता है। सशस्त्र सेनाओं के अफसर असैनिक अधिकारी और छात्र अपने शोध कार्य के संबंध में इतिहास प्रभाग के अभिलेखों का उपयोग करते हैं।(आवरण/रेखाचित्रः संगीता जैन)
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