विचार क्रान्ति-: जो पुराना है वह जाएगा। जो मृत है वह गिरेगा क्योंकि धर्मयुद्ध छेड़ दिया है ओशो ने। और यह धर्मयुद्ध धर्म की जीत तक धर्म की स्थापना तक चलने वाला है। यह युद्ध कोई दो देशों के बीच का युद्ध नहीं है कि इसमें कोई समझौता हो जाए। यह तो अंत तक चलने वाला है और अंतत: धर्म जीतेगा सत्य जीतेगा यह संन्यासी योद्धा जीतेगा। यह तय है। इस धर्मयुद्ध को छिड़े करीब बीस वर्ष बीत गए हैं इस तरह हिसाब लगाते हैं तो कभी-कभी दुश्चिंता होती है कि अबतक तो लगभग आधी मनुष्यता को खबर लग जानी चाहिए थी कि यह संन्यासी योद्धा हमारा शत्रु नहीं बल्कि परम मित्र है। यह हमारी बेड़ियां काटने वाला मुक्तिदाता है। इस खबर के न लगने से बड़ा अहित हुआ है। मनुष्य जाति के इस अहित के लिए जिम्मेदार हैं वे लोग जो संचार माध्यमों पर कुंडली मारे बैठे हैं।मैं मृत्यु सिखाता हूं-:समाधि में साधक मरता है स्वयं और चूंकि वह स्वयं मृत्यु में प्रवेश करता है वह जान लेता है इस सत्य को कि मैं हूं अलग शरीर है अलग। और एक बार यह पता चल जाए कि मैं हूं अलग मृत्यु समाप्त हो गई। और एक बार यह पता चल जाए कि मैं हूं अलग और जीवन का अनुभव शुरू हो गया। मृत्यु की समाप्ति और जीवन का अनुभव एक ही सीमा पर होते हैं एक ही साथ होते हैं। जीवन को जाना कि मृत्यु गई मृत्यु को जाना कि जीवन हुआ। अगर ठीक से समझें तो ये एक ही चीज को कहने के दो ढंग हैं। ये एक ही दिशा में इंगित करने वाले दो इशारे हैं।—ओशो मृत्यु से अमृत की ओर ले चलने वाली इस पुस्तक के कुछ विषय बिंदु :* मृत्यु और मृत्यु-पार के रहस्य* सजग मृत्यु के प्रयोग* निद्रा स्वप्न सम्मोहन व मूर्च्छा के पार — जागृति* सूक्ष्म शरीर ध्यान व तंत्र-साधना के गुप्त आयामअनुक्रम#1: ध्याआयोजित मृत्यु अर्थात न और समाधि के प्रायोगिक रहस्य#2: आध्यात्मिक विश्व आंदोलन—ताकि कुछ व्यक्ति प्रबुद्ध हो सकें #3: जीवन के मंदिर में द्वार है मृत्यु का#4: सजग मृत्यु और जाति-स्मरण के रहस्यों में प्रवेश#5: स्व है द्वार—सर्व का#6: निद्रा स्वप्न सम्मोहन और मूर्च्छा से जागृति की ओर#7: मूर्च्छा में मृत्यु है और जागृति में जीवन#8: विचार नहीं वरन् मृत्यु के तथ्य का दर्शन#9: मैं मृत्यु सिखाता हूं#10: अंधकार से आलोक और मूर्च्छा से परम जागरण की ओर#11: संकल्पवान—हो जाता है आत्मवान#12: नाटकीय जीवन के प्रति साक्षी चेतना का जागरण#13: सूक्ष्म शरीर ध्यान-साधना एवं तंत्र-साधना के कुछ गुप्त आयाम#14: धर्म की महायात्रा में स्वयं को दांव पर लगाने का साहस#15: संकल्प से साक्षी और साक्षी से आगे तथाता की परम उपलब्धि