इस पुस्तक को लिखने के पीछे एक आग्रह तो यह रहा है कि इस गुणात्मक परिवर्तन को समझा जाये। हर परिवर्तन विकास नहीं होता वह अपकर्ष भी होता है। लघु सोच से लोकतंत्र की भव्य इमारत नहीं खड़ी जा सकती है। संभवतः इसी कारण ब्रिटिश इतिहासकार एरिक हाब्सबॉम ने 20वीं सदी के विश्व-इतिहास को अतिवादों का दौर कहा है। वह एक साथ बड़े-बड़े साम्राज्यों के बनने-बिगड़ने बड़ी-बड़ी विचारधाराओं के निर्माण और उनके दमनकारी सत्ताओं में बदलने का समय है। यह इतिहास का सर्वाधिक बुरा समय है। यह विवेक और मूर्खता महाकाव्यांत्मक विश्वास और उसके खंडन प्रकाश और अंधकार आशा के वसंत और निराशा के पतझड़ स्वर्ग और नरक तथा भयंकर कोलाहल और रूहानी शांति का संयुक्त समय है जब हमारे सामने सबकुछ है और कुछ भी नहीं है। ये शब्द ब्रिटिश उपन्यासकार चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास ''टेल ऑफ टू सिटीज'' के प्रथम अनुच्छेद के हैं। संदर्भ याद नहीं है। शब्द याद हैं। जो भी हो वीसवीं सदी की सच्चाई यही है।
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