विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारतवर्ष के 26वें राज्य ‘छŸाीसगढ़’ अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता व प्राकृतिक पहचान लिये संपूर्ण विश्व का ध्यान अपनी ओर खींचता है। यहाँ की राजधानी रायपुर भारत का तेजी से विकसित होता हुआ एक चर्चित शहर है। रायपुर संभाग में ही विश्व स्तरीय सुव्यवस्थित एक शहर ‘नया रायपुर’ बसाया जा रहा है। छŸाीसगढ़ का उŸारतम् संभाग सरगुजा है जिसने प्रागैतिहासिक काल से लेकर आज तक के इतिहास को अपने में संजोये रखा है। एशिया की प्राचीनतम नाट्यशाला रामगढ़ पुराताŸिवक महŸव के महेशपुर व डीपाडीह से समृद्ध सरगुजा आपर संभावनाओं का संभाग है। वर्तमान में दुर्ग में नयी संभावनाएँ तलाशते हुए एक नया संभाग दुर्ग बनाया गया है। जनसंख्या की दृष्टि से छŸाीसगढ़ का सबसे बड़ा संभाग बिलासपुर है। यह छŸाीसगढ़ के राजस्व मण्डल का मुख्यालय भी है। यहाँ भारत का 19वाँ उच्च न्यायालय व 16वाँ रेलवे मण्डल (दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे) स्थित है। क्षेत्रफल की दृष्टि से छŸाीसगढ़ का सबसे बड़ा संभाग बस्तर है। बस्तर की प्राकृतिक वादियाँ चित्रकोट व कुटुमसर की गुफा बस्तर का दशहरा और बस्तर की कलात्मक वस्तुएँ विश्व प्रसिद्ध हैं। यद्यपि यहाँ सुदूर अंचलों में फैले नक्सलवाद ने भी इसे वैश्विक स्तर पर चर्चित बनाया है किन्तु तमाम नक्सल विरोधी अभियानों से इससे निजात पाने का प्रयत्न पिछले कई वर्षों से किया जा रहा है। वास्तविकता तो यह है कि खनिज भण्डारों से समृद्ध छŸाीसगढ़ को प्रकृति ने भरपूर प्यार दिया है। अब बारी हमारी है कि कशल मानव संसाधन से यहाँ के संसाधनों का समुचित उपयोग कर तेजी से उभरते वैश्विक शक्ति ‘भारत’ की प्रभावशाली उपस्थिति में छŸाीसगढ़ अपना अतुलनीय योगदान दे सके। आपके लिये यह पुस्तक प्रस्तुत करते हुए हम ऐसा ही एक प्रयास कर रहे हैं। इस प्रयास में छŸाीसगढ़ की माटी के एक ऐसे सपूत को जानने-समझने का प्रयास किया जाएगा जिसने आसमान की बुलंदियों को छुआ लेकिन अपनी धरती से जीवन भर इस तरह जुड़े रहे कि उनके व्यक्तित्व से माटी की महक आज भी आती है। कलम के धनी इस साहित्यकार ने लोकतंत्र के मजबूत स्तम्भ विधायिका को अपने विचार व कृत्य से ऋणि कर दिया। छŸाीसगढ़ के इस व्यक्ति को लोग ‘बाबूजी’ यानी पं. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल के नाम से जानते हैं। इस पुस्तक के निर्माण में हमने उनसे जुड़े तमाम साहित्यों का अध्ययन किया। हम उन सभी कलमकारों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करते हैं। हमने इस पुस्तक को आम लोगों के लिये सुग्राह्य करने के उद्देश्य से विधायिका की कठिनतम शब्दावलियों व चर्चाओं को आसान बनाने का प्रयास किया है। यद्यपि मानवीय त्रुटि से इंकार नहीं किया जा सकता। फिर भी भारत के संविधान की सामान्य जानकारी के साथ विधायिका के महŸव व पंडित राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल की भूमिका को उजागर करने का एक प्रयास मात्र है- यह रचना ताकि हम उनसे प्रेरणा ले सकें।