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About The Book
Description
Author
विरह एक छण का विरह अपने प्रिय से विरह खुद से विरह अपनी आत्मा से विरह जीवन के किसी ना किसी मोड़ पर इंसान उस काल से जरूर गुजरता है जिसमें वो किसी को खोने का वियोग और उसे पाने की इच्छा साथ-साथ करता है विरह काल उसी काल को पाठक को रूबरू करवाने की कोशिश करती है वो वेदना वो पीड़ा पाठक तक समझने और पढने की कोशिश करती है। यह हर व्यक्ति के उस क्षण समय काल का वर्णन हो सकता है जो कि उसने कभी ना कभी किसी के विरह में बिताया हुआ होगा। किसी के लिए यह काल सूक्ष्म हो सकता है और किसी के लिए दिर्घ पर कईओं के लिए यह काल अनन्त हो जाता है अर्थात सिर्फ शुरूआत है पर अन्त नही है। आज कल के समय एवं वातावरण एवं तकनीक का वृहद उपयोग में यह अनुभव करना की किसी के होने या ना होने से आप पर क्या अभाव एवं प्रभाव पडता है ये कईयों को पता ही नही चल पाता है। सभी रस के वर्णन में श्रृगांर रस का वर्णन कई भाषाओं में हुआ है इस रस के दो रूप हैं 1. संयोग श्रृगांर एवं 2. वियोग श्रृगांर जिसमें कवि द्वारा वियोग पर विरह-काल में दर्शाने की कोशिश की गयी है। वियोग की दस दशायें होती हैं अभिलाषा चिन्ता उद्वेग स्मरण गुण-कथन उन्माद प्रलाप व्याधि मूर्छा और अन्त में जड़ता अथवा मरण। इन सभी दशाओं का कभी ना कभी अनुभव कर कवि द्वारा यह लिखने का प्रयास किया गया है।