...इस संग्रह में केवल दलित-आदिवासी-स्त्री की वेदना और आक्रोश ही नहीं है। पूंजीवाद-राजनीति-धर्म के गठजोड़ ने आम आदमी का किस तरह शोषण किया है उन सूत्रें को भी उजागर किया है। बेरोजगारी से हताश नवयुवकों-जिजीविषा से भरे मूल आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करते मज़दूरों की भूख-बेबसी को भी अभिव्यक्त किया गया है। ...सुरसेन के इस कविता संग्रह ‘विरोध चुप्पियों का’ में दलित-वंचित चेतना भावबोध और संवेदना के स्तर पर अच्छी कविताएँ बन पड़ी हैं। भाषा और बुनावट सरल है। भाषा और शिल्प अभी प्रारंभिक स्तर पर है। लेकिन प्रारंभ से ही तो यात्र शुरू होती है। निश्चित ही आगे संश्लिष्टता के साथ-साथ शिल्प सौन्दर्य में भी निखार आएगा। ऐसा मुझे विश्वास है। सुरसेन जी को इस कविता संग्रह के लिए हार्दिक बधाई! --राजेन्द्र सजल