वायरस इंटरनेशनल। कभी काला बुखार कभी स्वाइन कभी सार्स-मार्श कभी कोरोना कभी कोई और पेनडेमिक। भयावहता के अन्तरराष्ट्रीय मृत्युकोष ने नया शब्द कोश रचवा दिया। युद्धों ने तो अस्तित्व का संकट दिया और मूल्यों का दर्शन भी। पर कोरोना की वैश्विक शमशानी भयावहता ने अपनी ही श्वासों से घबराये विश्व में रिश्तों को ही अस्पृश्य बना दिया। डॉ- हरीशकुमार सिंह की पुस्तक ‘वुहान से जहान तक’ संवेदना का कोरोना काल दृश्यमान समय बोध ही नहीं है बल्कि वैश्विक अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र लुढ़कते समय में मानवीय चिन्ताओं का वस्तुपरक आख्यान है।--बी एल आच्छा