डॉ- प्रेमचंद ‘द्वितीय’ का प्रस्तुत व्यंग्य संग्रह ‘व्यंग्य भए क्वारंटाइन’ कोरोना काल की त्रसदियों के बीच उभरी अनेक विसंगतियों को व्यंग्यात्मक रूप में प्रस्तुत करने का सफल प्रयास है। इससे पूर्व प्रकाशित उनके संग्रह ‘दूध में दूध लाला जी का दूध’ की रचनाओं में व्यंग्य को लेकर एक व्यापक नजरिया देखने को मिला था। उनकी व्यंग्य रचनाएं समकालीन समाज की कलुषता को उजागर करती हैं। रोचक और पठनीय तो वे होती ही हैं। -डॉ. जवाहर कर्णावट