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About The Book
Description
Author
मन कई भावनाओं से भरा होता है जो हमें उस समयावधि में महत्वपूर्ण लगती हैं पर धीरे- धीरे उसका प्रभाव सीमित होता जाता है। ये कवितायें उन महत्वपूर्ण बिंदुओ का जमा है जिन्हें मैं सीमित नहीं करना चाहता था। वो विचार वो आवेग और वो प्रभाव मैं संजोना चाहता था क्यूँकि शायद उन समयबिंदुओ में मैं थोड़ा सा मरा- थोड़ा जिया और उस मरने- जीने में मैं मैं बन गया। थोड़ी मोहब्बत की- थोड़ी आशिक़ी की थोड़ा भाई- थोड़ा बेटा बना कुछ खोया- कुछ पाया कभी रोया- कभी मुस्कुराया। ये संग्रह मेरे उमर का वो पायदान है जिसकी सीढ़ियाँ चढ़ते मैं ज़रा सा परिपक्व होने का भ्रम जुटा पाया हूँ और इसी भ्रम में मेरी उम्र का हर इंसान होता है। ज़िंदगी के उतार- चढ़ाव देखते हर इंसान उस भ्रम को अपनाता है और अंततः वो सारे महत्वपूर्ण बिंदु व्यर्थ के लगने लगते हैं जिनका अर्थ नहीं निकल पाता। आप भी अपने उन व्यर्थ के अर्थों को इस किताब के कुछ पन्नों में पढ़े क्यूँकि भावनायें सीमित नहीं वैश्विक होती हैं।