---यह शब्दचित्र पिछले बारह वर्षों में लिखे गए हैं। घर और गाँव से अलग रहते हुए जब-जब मुझे गाँव की याद आई तब-तब मैं इन शब्दचित्रें में बिंधा हूँ। जब जिस चरित्र ने मुझे अपनी ओर खींचा तब मेरे मस्तिष्क में उसका एक बिंब बना और ज्यों का त्यों शब्दों में बाँधने का प्रयास किया। ---सही मायनों में अब मेरा ‘जगतियापुर’ ---‘जगतपुर’ हो गया है। इस पुस्तक में आई सभी शब्दचित्रत्मक कहानियाँ ‘जगतियापुर’ के ‘जगतपुर’ में तब्दील हो जाने की कहानी बयां कर रही आपको महसूस होंगी। यह शब्दचित्र आपको कहीं पर कहानी-से कहीं पर संस्मरण-से कहीं पर निरे आलेख-से और कहीं पर बतकही-से प्रतीत होंगे। यह कहानियाँ आप शिल्प और साहित्य की दृष्टि से बिलकुल ही न पढ़े। अन्यथा निराशा के अलावा कुछ भी हाथ न लगेगा। सामान्य व्यक्ति के सामान्य भाव ही इन्हें समझें जो अपने गाँव की अनगढ़ संस्कृति को समाज के सामने लाने का प्रयास है।---सुनील मानव