योगेंद्र कृष्णा की कविता का परिदृश्य न सिर्फ़ वस्तु के स्तर पर बल्कि काव्यभाषा विन्यास और रूप के स्तर पर भी वैविध्यपूर्ण है। मूड स्थितियों क्रियाओं दृश्यों प्रकृति यथार्थ और चरित्रों के गुंफन से कविताएँ अपनी संश्लिष्टता में अपने पाठक पर वांछित प्रभाव डालती हैं।… ये कविताएँ न सिर्फ़ पठनीय हैं बल्कि उनमें साधारण जीवन की असाधारण आभा है। उनकी काव्यभाषा अपने काव्यानुभव को पाठक के जीवनानुभव से जोड़ती है। पाठक के साथ आत्मीय रिश्ता बनाती है। इन प्रतिनिधि कविताओं में योगेंद्र कृष्णा की कविता का समग्र परिसर मौजूद है। योगेंद्र की कविता न सिर्फ़ जीवन में गहरे धँसे कवि के जीवनानुभव की कविता है बल्कि जीवन की आलोचना और परिवेश की पुकार की कविता है। जीवन के छोटे-छोटे सुख और बड़े दुख के पाटों के बीच उनकी कविता आगे बढ़ती है।