अपनी कहानी सुनाना मेरे लिए उतना आसान नहीं होगा क्योंकि पिछली ज़िंदगी के कई ऐसे पीड़ादायक प्रसंगों/अनुभवों को दोबारा झेलने के लिए ख़ुद को तैयार करना पड़ेगा जिन्हें मैं भुला चुका था या कम-से-कम भुला देने की कोशिश करता रहा था। सच कहूँ तो उनमें से कई बातों का ज़िक्र तो मैंने अपने निहायत क़रीबी जनों से भी नहीं किया है। मेरा वश चलता तो भुला ही डालता उन बातों को। लेकिन प्रखर स्मरण शक्ति न होने के बावजूद वे बातें मेरे ज़ेहन में कील की तरह गड़ी हुई हैं। ख़ुशी के क्षणों में यकायक याद आ जाती हैं। सपनों में ज़िंदा हो उठती हैं। कभी-कभी तब भी पुराने ज़ख़्मों की तरह हरी हो उठती हैं जब इतना ‘सम्मानित’ व्यक्ति बन जाने के बावजूद यह समाज मेरे साथ (या मेरे जैसे अन्य लोगों के साथ) बदस्तूर वैसा ही ‘सुलूक’ करता नज़र आता है जैसा यह सदियों से करता आ रहा है।(इसी पुस्तक से)