एक युवा घुमक्कड़ की एक संन्यासी से मुलाक़ात की यह कहानी देश और दुनियाभर के घुमक्कड़ों के लिए कुछ नए रास्ते खोलती है। एक साधु और घुमक्कड़ में बहुत सारी समानता होने के बावजूद सबसे बड़ी भिन्नता यह होती है कि एक घुमक्कड़ अपनी मामूली ज़रूरतों को साथ लेकर चलता है। साधु निरा ही फक्कड़ होता है उसे किसी चीज़ की फ़िक्र नहीं होती है। अपने को जन्मजात घुमक्कड़ मानने वाले लेखक संजय शेफ़र्ड की यह किताब ‘ज़िंदगी ज़ीरो माइल’ यह रेखांकित करती है कि एक संन्यासी एवं घुमक्कड़ की मुलाक़ात एक तरह से घुमक्कड़ी और फक्कड़ी का ही एक संयोग है। हिमालय की पहाड़ियों की ख़ूबसूरत यात्रा करके लौटे संजय शेफ़र्ड की यह घुमक्कड़-कथा ‘अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा’ की परंपरा को एक नया आयाम देती है।
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