<p>इस दुनिया में कीमत दिए बिना कोई चीज नहीं मिलती। इसी तरह दुख सहकर कीमत चुकायी जा सकती है। यह बात कालीपद अपनी माता के सहयोग से जितना ज्यादा समझने लगा उतना ही वह देखते-ही-देखते जैसे भीतर से बड़ा होने लगा। वह अब सभी कामों में अपनी माँ की मदद करता। उसने अच्छी तरह समझ लिया था कि गृहस्थी का वजन संभालना अच्छा है बढ़ाना अच्छा नहीं। यह बात बिना उपदेश के ही उसके खून के साथ मिल गई।</p> <p>जिंदगी की जिम्मेदारी कबूल करने के लिए उसे तैयार होना पड़ेगा इस बात को ध्यान में रखकर कालीपद जी-जान से कोशिश करने लगा। वजीफे के इम्तिहान में पास होकर उसने वजीफा हासिल किया। भवानीचरण ने सोचा अब उसे ज्यादा पढ़ने की जरूरत नहीं है यदि वह जायदाद की देखभाल करने लग जाए तो ठीक रहेगा।</p>