Yogayog

About The Book

रास के मौके पर धूम मची। कुछ कलकत्ता से और कुछ ढाका से मनोरंजन का सरंजाम आया। घर के आँगन में कभी कृष्ण-यात्ना होती थी और कभी कीर्तन। वहाँ स्त्रियों और टोले-मोहल्ले के साधारण लोगों की भीड़ लगी रहती थी। आमतौर पर तामसिक आयोजन होता था बैठकखाने में। अंतः पुरिकाएँ रात में उनींदी आँखों से हृदय में पीड़ा की फाँस लिए दरवाज़े के छिद्रों से इस राग-रंग का कुछ-कुछ आभास पा सकती थीं। पर इस बार उनको यह धुन सवार हुई कि बाई-नाच की व्यवस्था होगी नदी के ऊपर बजरे में। क्या हो रहा है यह देखने का उपाय न होने के कारण नंदरानी का मन रँधी हुई वाणी के अंधकार में छटपटाता हुआ रोने लगा। इस सबके बावजूद घर के काम-काज लोगों को खिलाना-पिलाना देखना-सुनना यह सब ऊपर से प्रसन्न भाव से ही करना पड़ता था। दिल के भीतर का जो काँटा हिलते-डुलते सब समय गड़ता ही रहता था उसकी प्राणघाती पीड़ा बाहर से कोई जान नहीं पाता था। उधर से रह-रहकर तृप्त गले की यह आवाज़ कानों में आती रहती ''जय हो रानी माँ की।''
Piracy-free
Piracy-free
Assured Quality
Assured Quality
Secure Transactions
Secure Transactions
Delivery Options
Please enter pincode to check delivery time.
*COD & Shipping Charges may apply on certain items.
Review final details at checkout.
downArrow

Details


LOOKING TO PLACE A BULK ORDER?CLICK HERE